राहुल मिश्र, कोलकाता

बीवी की मरम्मत करना कुछ मर्दो के लिए गर्व की बात होती है. तभी तो इसका एलान वे अपने दोस्तों में सीना ठोक कर करते हैं, मानो शादी के समय उन्हें समय-समय पर बीवी की मरम्मत करने की खास जिम्मेदारी दी गयी हो. मेरे एक परिचित सुबह-सुबह आये और कहने लगे, चली गयी वो, चारों बच्चों को लेकर मायके.
मैंने भी कह दिया, जा रही हो तो हमेशा के लिए जाओ. लौट के मत आना. मैंने पूछा, अचानक ऐसा क्या हुआ, जो भाभी चली गयीं? उन्होंने कहा- मत पूछो, नाक में दम कर रखा था. जब से उसकी मां और भाइयों को घर आने से मना कर दिया, तब से दुश्मन जैसा बरताव कर रही थी. बच्चों को मेरे खिलाफ सिखाती-पढ़ाती है.
कल मेरी बहन आयी थी, तो उसके साथ बदतमीजी करने लगी. बताओ, कोई मर्द यह बरदाश्त कर सकता है. इसी पर उसकी जम कर मरम्मत कर दी. तो रो-रो कर पूरा मोहल्ला जमा कर लिया. अपनी मां को फोन लगा दिया. उस बुढ़िया ने उसे चले आने को कहा. सारे फसाद की जड़ वही बुढ़िया है. कभी उसकी भी मरम्मत करूंगा, तब होश ठिकाने आयेगा.
मैंने समझाया- देखिए, ऐसे मारपीट मत किया कीजिए. छोटे-छोटे बच्चे हैं, उनके दिमाग पर बुरा असर पड़ता है. पति-पत्नी लड़ते-झगड़ते रहेंगे, तो पूरा परिवार नष्ट हो जायेगा. बच्चे दुश्मन बन जायेंगे. उनकी पढ़ाई बरबाद हो जायेगी. कहीं गुस्से में किसी ने कुछ कर लिया, तो कहीं के नहीं रहेंगे. इस पर वह कहने लगे, बच्चे तो बरबाद हो ही रहे हैं.
सब उसकी और उसके मायकेवालों की गलती है. मैं कमा-कमा कर रुपये लाता हूं, वो खर्च करती है. हाथ में रुपये दे दो, तो दुनिया में जो कुछ है, वो मैं ही हूं. थोड़ा डांट दो, तो सीने पर चढ़ आती है. इसीलिए कभी-कभी मरम्मत कर देना पड़ता है. घर में जहां-तहां खाने, बरतन, कपड़े बिखरे पड़े हैं. सब वैसे ही छोड़ कर चली गयी. देखते हैं कब तक वहां रहती है.
मैंने सोचा, इतनी कड़वाहट के बीच कैसे रहते हैं लोग एक साथ. लेकिन रहना तो साथ-साथ है. बच्चे हैं और उनका भविष्य भी. मेरे मित्र यह समझते ही नहीं कि हर आदमी एक जैसा नहीं होता. सबका व्यवहार-विचार, आदत, रहन-सहन का तरीका अलग होता है. जरूरी नहीं कि पति को जो अच्छा लगता है, पत्नी को भी लगे.
या फिर इसका उल्टा. साथ रहने के लिए एक दूसरे के मन को समझना और तरजीह देना होगा. यह सोचना कि सिर्फ आपकी वजह से परिवार चलता है और आप जैसा चाहते हैं, वैसा ही दूसरे करें, तो यह गलत है. इससे मनमुटाव-द्वेष बढ़ता है और प्रेम-सम्मान घटता है. आपकी बीवी और बच्चों की बातें भी परिवार में उतनी ही महत्वपूर्ण हैं, जितनी आपकी. इसलिए बीवी की मरम्मत के बजाय अपने सोच की मरम्मत करें, तो बेहतर होगा.


 
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